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NGT imposes Rs 900-cr fine on Delhi govt: एनजीटी का केजरीवाल सरकार पर 900 करोड़ का जुर्माना कितना सही है?

NGT imposes Rs 900-cr fine on Delhi govt
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दिल्ली एक ऐसा राज्य है जहाँ सफाई को लेकर दिल्ली सरकार और निगम एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप का खेल शुरू से खेलते आये हैं। यह दिल्ली का इस मामले में दुर्भाग्य है कि पिछले 15 सालों से निगम में भाजपा है और सत्ता में पहले कांग्रेस और फिर अब आम आदमी पार्टी। क्योंकि इससे पहले जब कांग्रेस दोनों जगहों पर थी तो उसके पास काम करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। काम किया तो तारीफ भी उसकी और अगर नहीं किया तो बुराई भी उसकी। ऐसे में अगर आज भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों आपस में लड़ रहे हैं और कूड़े की राजनीति कर रहे हैं तो यह दिल्लीवालों के लिए काफी दुर्भाग्य की बात है।

इसी सिलसिले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा राजधानी दिल्ली में गाजीपुर, भलस्वा और औखला की तीनों लैंडफिलों पर ठोस कचरे के अनुचित प्रबंधन के लिए 900 करोड़ जुर्माना केजरीवाल सरकार पर लगा दिया है। हालांकि तीनों लैण्डफील के लिए निगम और दिल्ली सरकार दोनों बराबर जिम्मेदार है। क्योंकि यह दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम के कुप्रबधन और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के कारण हुआ है। दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम द्वारा ठोस कचरे का निवारण करने में विफलता का ही परिणाम है कि तीनों लैंडफिलों पर 80 प्रतिशत कचरा पुराना जमा हुआ है और तीनों साईटों पर 300 लाख मीट्रिक टन कचरे का किसी भी तरीके से प्रबंधन और निवारण करने में दोनो सरकारें पूरी तरह से फेल रही हैं।

लैंडफिल साइट पर वर्षों से जमा कूड़े का उचित प्रबंध न होने और इससे बढ़ते प्रदूषण की समस्या पर चिंता जाहिर करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली सरकार पर 900 करोड़ का पर्यावरण हर्जाना लगाया है और यह भी कहा कि हर्जाने की रकम का इस्तेमाल कूड़े का उचित निवारण नहीं होने से पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई पर खर्च किया जाएगा। जिसमें ट्रिब्यूनल ने लैंडफिल साइट्स की बहाली के बराबर जुर्माने का आंकलन करते हुए 300 रुपये प्रति मैट्रिक टन के हिसाब से 900 करोड़ का जुर्माना तय किया है।

एनजीटी ने इसे चिंताजनक बताते हुए कहा है कि ‘शासन की कमी के कारण आम लोगों को आपात स्थिति का सामना करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है और लैंडफिल साइटों के आसपास भूजल प्रदूषण के साथ-साथ मीथेन और अन्य हानिकारक गैसों का लगातार उत्सर्जन हो रहा है, बावजूद इसके बार-बार आग आग लगने की घटनाओं को रोकने के न्यूनतम सुरक्षा उपायों को भी नहीं अपनाया गया। जिस वजह से दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग और दिल्ली नगर निगम दोनों जिम्मेदार हैं। यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया गया है कि मौजूदा कचरे को पुराने कचरे में शामिल नहीं किया जाए। दिल्ली सरकार और NGT के बीच में पहले भी कई बार तकरार हो चुकी है जैसे बढ़ते प्रदूषण को लेकर NGT पहले भी कई बार दिल्ली सरकार को फटकार चुका है ।

अब सवाल यह है कि एनजीटी के इस आदेश के बाद की रूपरेखा क्या होगा। दिल्ली सरकार को 900 करोड़ रुपये की बड़ी राशि के मुआवजा का एनजीटी को भुगतान करने के आदेश का असर दिल्ली की टैक्स पेयर जनता पर अनुचित भार पड़ेगा, जबकि दिल्ली सरकार का 38155 करोड़ का बजटीय घाटा पहले ही CAG द्वारा उजागर हो चुका है। इस पूरे मामले में बराबर का जिम्मेदार दिल्ली नगर निगम की लापरवाही और कुप्रबंधन के चलते 152 एकड़ की सावर्जनिक जमीन पर बने तीनों लैंडफिलो में ठोस कचरे के पहाड़ बनने से राजधानी में पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है जिससे दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में से एक बन गई है। कचरों के जमा होने के बाद सांस सम्बंधित बीमारियां होने की पूरी संभावनाएं बढ़ गई है और तेज हवा जब भी चलती है कूड़े में आग जनी का होना स्वाभविक है।

तीनों लैंडफिलें राजधानी के बार्डरों पर स्थित है जिससे दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों पर इन लैंडफिलों पर कूड़े के पहाड़ो को देखकर दिल्ली की दागदार छवि उजागर हुई है। जुलाई 2019 में एनजीटी ने लैंडफिलों  से कचरा हटाने का आदेश दिया था परंतु 38 महीनों में अब तक मात्र 59 लाख टन कचरा हटाया गया है, कचरा निवारण की रफ्तार यदि यही रही तो बाकी कचरे को हटाने में लगभग 12 साल लग जाऐंगे। केजरीवाल की दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम की  लैंडफिलों  से कचरा निवारण की रफ्तार चिंताजनक है।

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