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Malala: The girl who was shot for going to school

समाज में शिक्षा की अलख जगाने वाली मलाला को 10 साल पहले आज के दिन तालिबानियों ने मारी थी गोली, सबसे कम उम्र में मिला था नोबेल प्राइज

Malala: The girl who was shot for going to school
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आज एक ऐसी लड़की के बारे में बात करेंगे जो अपने समाज में शिक्षा का अलख जगा रही थी। इसके साथ यह बच्चों को स्कूल भेजने के प्रति जागरूक भी कर रही थी। लेकिन कुछ कट्टरपंथियों को लड़की का यह सामाजिक जागरूकता पसंद नहीं आई। हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई की । दरअसल, पाकिस्‍तान की स्‍वात घाटी में मलाला लड़कियों की शिक्षा को लेकर जागरुकता फैलाने का काम करती थी। यही बात तालिबान का नागवार गुजरी थी। 10 साल पहले आज के दिन यानी 9 अक्टूबर साल 2012 को तालिबान ने मलाला को सिर पर गोली मार दी थी। तब मलाला 15 साल की थी। ‌हालत इतनी खराब थी कि कोमा में ही उसे इलाज के लिए यूके लेकर जाना पड़ा था। दरअसल, मलाला ने बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखनी शुरू की, तो वे सुर्खियों में आईं। यह डायरी बाहरी दुनिया के लिए थी, जिसमें वे स्वात घाटी में तालिबान के साए में जिंदगी बयां करती थीं। मलाला से चरमपंथी नाराज थे, इसलिए उन पर हमला किया। इलाज के बाद मलाला और उसके परिवार को ब्रिटेन ने अपनी नागरिकता दी थी। यहां से ही मलाला ने अपनी शिक्षा पूरी की। मलाला को पाकिस्‍तान में शिक्षा के प्रति लड़कियों को जागरूक करने की मुहिम के लिए यूरोपीय यूनियन से वर्ष 2013 में प्रतिष्ठित शैखरोव मानवाधिकार पुरस्कार से नवाजा गया था। वर्ष 2014 में मलाला को भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वो इस पुरस्‍कार को पाने वाली सबसे कम उम्र (17 साल) की विजेता हैं। मलाला का जन्म 1997 में पाकिस्तान के खैबर पख्‍तूनख्‍वा प्रांत की स्वात घाटी में हुआ। मलाला के पिता का नाम जियाउद्दीन यूसुफजई है। साल 2007 से मई 2009 तक स्वात घाटी पर तालिबानियों ने खूब आतंक मचा रखा था। तालिबान आतंकियों के डर से लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया था। मलाला तब आठवीं की छात्रा थीं और उनका संघर्ष यहीं से शुरू होता है। तालिबान ने 2008 में स्वात घाटी को अपने नियंत्रण में लेने के बाद वहां डीवीडी, डांस और ब्यूटी पार्लर पर बैन लगा दिया। साल के अंत तक वहां करीब 400 स्कूल बंद करा दिए गए। इसके बाद मलाला के पिता उसे पेशावर ले गए जहां उन्होंने नेशनल प्रेस के सामने वो मशहूर भाषण दिया जिसका शीर्षक था- हाउ डेयर द तालिबान टेक अवे माय बेसिक राइट टू एजुकेशन? तब वो केवल 11 साल की थीं। साल 2009 में उसने अपने छद्म नाम ‘गुल मकई’ से बीबीसी के लिए एक डायरी लिखी। इसमें उन्होंने स्वात में तालिबान के दुष्कर्म का वर्णन किया था। बीबीसी के लिए डायरी लिखते हुए मलाला पहली बार दुनिया की नजर में तब आईं, जब दिसंबर 2009 में जियाउद्दीन ने अपनी बेटी की पहचान सार्वजनिक की। 2012 को तालिबानी आतंकी उस बस पर सवार हो गए, जिसमें मलाला अपने साथियों के साथ स्कूल जाती थीं। उनमें से एक ने बस में पूछा, ‘मलाला कौन है?’ सभी खामोश रहे लेकिन उनकी निगाह मलाला की ओर घूम गईं। इससे आतंकियों को पता चल गया कि मलाला कौन है। उन्होंने मलाला पर एक गोली चलाई जो उसके सिर में जा लगी। तालिबान के इस कायरता हरकत पर दुनिया ने निंदा की थी। ‌

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