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Government declares PFI (Popular Front of India) and its associates or affiliates or fronts as an unlawful association with immediate effect

देश में 5 सालों तक बैन हुई पीफआई, जानें क्यों हुई बैन, क्या है इसका काम

Government declares PFI (Popular Front of India) and its associates or affiliates or fronts as an unlawful association with immediate effect
Government declares PFI (Popular Front of India) and its associates or affiliates or fronts as an unlawful association with immediate effect
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देश में पिछले कई दिनों से लगातार हो रही छापेमारी के बाद गृह मंत्रालय ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई पर बैन लगाने की घोषणा कर दी है। इससे पहले कई राज्यों ने पीएफआई को प्रतिबंधित करने की मांग की थी। गृह मंत्रालय का कहना है कि PFI के कई पदाधिकारियों के टेरर फंडिंग में लिंक के चलते यह फैसला लिया गया है।

क्या है पीएफआई? इस संगठन पर क्या-क्या आरोप है?

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी PFI 22 नवंबर 2006 को तीन मुस्लिम संगठनों के मिलने से बना था। इनमें केरल का नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु का मनिता नीति पसरई साथ आए। वहीं PFI खुद को गैर-लाभकारी संगठन बताता है। PFI में कितने सदस्य हैं, और इसकी जानकारी संगठन नहीं देता है।
PFI दावा करता है कि 20 राज्यों में उसकी यूनिट है। शुरुआत में PFI का हेडक्वार्टर केरल के कोझिकोड में था, लेकिन बाद में इसे दिल्ली शिफ्ट कर लिया गया और फिल्हाल ओएमए सलाम इसके अध्यक्ष हैं और ईएम अब्दुल रहीमान उपाध्यक्ष।

बता दें कि देश के 15 राज्यों में PFI पिछले कई महीनों से सक्रिय है। गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि दिल्ली, आंध्र,प्रदेश, असम, बिहार, केरल, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, तमिलनाडु, तेलंगाना, मध्य प्रदेश में PFI सक्रिय है. हाल ही में PFI से जुड़े कई मामले सामने आये है, जिसकी जां NIA कर रही है।

15 राज्यों में NIA की छापेमारी में सामने आए कई मामले:

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के टेरर कनेक्शन पर पुख्ता सबूत मिलने पर शहर-शहर से संदिग्ध उठाए गए। हा हीं में 22 सितंबर को 15 राज्यों में 106 जगहों पर एनआईए ने छापा मारा था। पांच दिन बाद मंगलवार को फिर छापेमारी हुई। यूपी के करीब 26 जिलों से 56 लोगों को उठाया गया, जिसमें लखनऊ, कानपुर गाजियाबाद, मेरठ और बुलंदशहर जिले शामिल हैं।

लखनऊ में एनआईए और एटीएस की टीम ने छापेमारी करके बख्शी तालाब के गांव से छह लोगों को हिरासत में लिया। मध्य प्रदेश के कई इलाकों में भी इस वक्त छापेमारी की गई। भोपाल में पीएफआई के 21 लोगों को हिरासत में लिया गया। मध्य प्रदेश के शाजापुर में 3 लोग पकड़े गए, जबकि इंदौर में पीएफआई के तीन कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है।

इनमें सबसे ज्यादा बड़ी छापेमारी कर्नाटक में हुई, जहां पीएफआई और एसडीपीआई के करीब 45 लोगों को पकड़ा है। गुजरात के कई शहरों में पीएफआई के ठिकानों की तलाशी चल रही है। एटीएस की टीम ने अहमदाबाद,सूरत,नवसारी और बनासकांठा से 15 लोगों को हिरासत में लिया है जिनके तार विदेशो में भी है।

जांच एजेंसियों के रडार पर क्यों रहा है PFI?

NIA महाराष्ट्र के नवी मुंबई औरंगाबाद, जालना, सोलापुर और परबनी में रेड किया है। असम के 8 जिलों में भी पीएफआई के ठिकानों पर छापा मारकर 21 लोगों को पकड़ा गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जांच एजेंसियों के रडार पर पीएफआई क्यों है? दरअसल PFI को अगर विवाद का दूसरा नाम कहा जाए, तो गलत नहीं होगा।

मालूम हो कि PFI के कार्यकर्ताओं पर अक्सर आतंकी संगठनों से कनेक्शन से लेकर हत्याएं तक के आरोप लगते हैं। 2012 में केरल सरकार ने हाईकोर्ट में बताया था कि हत्या के 27 मामलों से PFI का सीधा-सीधा कनेक्शन है। इनमें से ज्यादातर मामले RSS और CPM के कार्यकर्ताओं की हत्या से जुड़े थे।

जुलाई 2012 में कन्नूर में एक स्टूडेंट सचिन गोपाल और चेंगन्नूर में ABVP के नेता विशाल पर चाकू से हमला हुआ। इस हमले का आरोप PFI पर लगा। बाद में गोपाल और विशाल दोनों की ही मौत हो गई. 2010 में PFI के SIMI से कनेक्शन के आरोप भी लगे। उसकी वजह भी थी। दरअसल, उस समय PFI के चेयरमैन अब्दुल रहमान थे, जो SIMI के राष्ट्रीय सचिव रहे थे। जबकि, PFI के राज्य सचिव अब्दुल हमीद कभी SIMI के सचिव रहे थे। उस समय PFI के ज्यादातर नेता कभी SIMI के सदस्य रहे थे। हालांकि, PFI अक्सर SIMI से कनेक्शन के आरोपों को खारिज करता रहा है।

CAA आंदोलन के दौरान भी हिंसा भड़काने का आरोप

जनवरी 2020 में भी जब देशभर में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और हिंसा हुई, तब तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इसमें PFI की भूमिका होने का दावा किया था। हालांकि, PFI ने इन प्रदर्शनों में उसका हाथ होने की बात खारिज कर दी थी। हालांकि, PFI ने कहा था कि उनका संगठन कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से काम करता है।

पिछले साल मार्च 2021 में यूपी एसटीएफ ने शाहीन बाग में स्थित PFI के दफ्तर की तलाशी ली थी। इससे पहले एक बार और भी PFI ऑफिस की तलाशी ली जा चुकी है। बता दें कि ED पीएफआई द्वारा कथित रूप से मनी लॉन्ड्रिंग और विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर दिल्ली और यूपी के दंगों में इसकी भूमिका की जांच कर रहा है।

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