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Delhi Liquor Policy: भाजपा-कांग्रेस की मुफ्त क्रेडिट खोरी या केजरीवाल सरकार का यू-टर्न, नई आबकारी नीति वापस लेने की क्यों पड़ी जरूरत

Delhi Liquor Policy
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केजरीवाल सरकार की नई आबकारी नीति पर यू-टर्न लेना, मजबूरी या सोची-समझी चाल। इस सवाल का अगर जवाब ढूंढने की कोशिश करें तो कई अनसुलझी पहेलियों को सुलझाना पड़ेगा। क्योंकि यह सवाल पढ़ने में जितना आसान है उतना ही समाधान करने में कठिन। और इसी सवाल पर फिलहाल पूरी तरह से दिल्ली की सियासत में बवाल चल रहा है। इसका कारण है कि एक ओर भाजपा-कांग्रेस का क्रेडिडखोर हो जाना और दूसरी तरफ केजरीवाल सरकार द्वारा इस वापसी के कारणों को जस्टिफाई करना। आज 31 जुलाई है और नई आबकारी नीति की समाप्ति की तारीख भी। इसलिए इस सवाल को विस्तृत ढंग से समझने की जरूरत है?

भाजपा और कांग्रेस का दावा

केजरीवाल सरकार ने जैसे ही नई आबकारी नीति वापस लेने की बात कही भाजपा और कांग्रेस में एक होड़ सी लग गई इसका क्रेडिट लेने की। भाजपा के सांसद, प्रदेश अध्यक्ष सहित केंद्रीय मंत्री तक इसपर प्रेसवार्ता कर इसको भाजपा की जीत बताने लगे। सांसद मनोज तिवारी और प्रवेश साहिब सिंह ने इसपर प्रतिक्तिया व्यक्त करते हुए कहा कि उपराज्यपाल द्वारा सीबीआई जांच बैठाने से घबराकर यह आबकारी नीति वापस ले ली गई। जबकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने यहां तक कह दिया कि भाजपा पिछले एक सालों से इस आबकारी नीति के खिलाफ आवाज़ उठाती रही है जिसका परिणाम आज सबके सामने आ गया है। केंद्रीय मंत्री ने भी इसमें अपना भी व्यक्तब्य दे दिया। मीनाक्षी लेखी का कहना था कि 850 शराब के ठेके खोलने के लिए खूब पैसा बटोरा गया है और अब सीबीआई इसका हिसाब न ले ले इस डर से यह शराब नीति वापस ले लिया गया।

कांग्रेस ने भी बहती गंगा में हाथ धोने का काम किया। कांग्रेस का कहना है कि फिर से पुरानी आबकारी नीति को लागू करना सरकार की नाकामी और नई आबकारी नीति में भ्रष्टाचार साबित करता है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के लिए नई आबकारी नीति गले की फांस बन गई है, जिसे न उगला जाए और न निगला जाए। कल तक यह दोनों दावा करते नहीं थक रहे थे कि उपराज्यपाल ने जो सीबीआइ जांच के आदेश दिए हैं, उसमें कुछ नहीं निकलेगा। कोई इनसे पूछे कि अब क्या हो गया?

केजरीवाल सरकार ने क्या पक्ष रखा?

केजरीवाल सरकार की ओर से आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया कह रहे थे कि 2021-22 की पॉलिसी 31 जुलाई यानी आज खत्म हो रही है। उन्होंने कहा कि अब नई पॉलिसी बंद करके, सरकारी दुकान खोलने के आदेश दिए है। सरकारी दुकानों के जरिए कानूनी तौर पर शराब बेचने का ऑर्डर दिया है। मुख्य सचिव को ऑर्डर दिया है कि सरकारी दुकानों के जरिए भ्रष्टाचार नहीं हो। दिल्ली में अवैध दुकान न खुले। इससे पहले आबकारी नीति 2021-22 को 31 मार्च के बाद दो बार दो-दो महीने की अवधि के लिए बढ़ाया गया था।

केजरीवाल का फैसला सही या गलत?

विपक्ष में बैठी भाजपा ने इसके खिलाफ खूब नारेबाजी की साथ में महिला संगठनों और आरडब्ल्यूए के संगठनों का साथ मिला। जब दिल्ली में उपराज्यपाल अनिल बैजल थे उस समय यह नई आबकारी नीति लागू हुई और जब नए उपराज्यपाल वी के सक्सेना आए तो उन्होंने इस पर 22 जुलाई को सीबीआई जांच बैठा दी। अब 22 को सीबीआई जांच बैठना और 30 जुलाई को नई आबकारी नीति को वापस लेना, इन दोनों को एक साथ जोड़कर भाजपा यह नतीजा निकाल रही है कि नई आबकारी नीति के तहत जो भ्रष्टाचार के आरोप मनोज तिवारी ने सबसे पहले लगाए थे वह सच है और उसी के डर से यह फैसला लिया गया।

केजरीवाल सरकार इसके पीछे चाहे जितनी बार इस पॉलिसी की तारीख खत्म होने का दावा करती रहे, लेकिन यह नाजुक समय है सिर्फ अफवाहों का जो सच की झूठी बौछारों के साथ केजरीवाल सरकार की सत्ता और उनके करतूतों पर पड़ती रहेगी। यह भी अजीब बिडम्बना कहिए या संयोग कि कल तक जो केजरीवाल सरकार गुजरात में नकली शराब से हुई 42 लोगों की मौत पर भाजपा सरकार को इस्तीफा देने तक की बात कह रही थी और आएम आदमी पार्टी के नेता इसी चक्कर में संसद से निलंबित होकर अनशन पर बैठे हैं आज वही सरकार शराब को लेकर कटघरे में और शक की अदालत में खड़ी है।

उड़ती अफवाहों में कितनी सच्चाई?

केजरीवाल सरकार दावा जरूर कर रही है कि ये सब झूठ और लोगों को गुमराह करने का काम भाजपा इसलिए भी कर रही है ताकि वे नकली शराब दिल्ली में बेच सके जैसे गुजरात में बेच रही है। लेकिन अगर भाजपा के दावे में थोड़ी भी सच्चाई है और नई आबकारी नीति के तहत ठेके खोलने के लिए करोड़ो वसूल किये गए हैं तो इस हकीकत से भी केजरीवाल सरकार गुरेज नहीं कर सकती कि अब पुरानी शराब नीति के तहत भी ठेके खोलने के लिए ठेकेदार पीछे हटेंगे। इसका प्रमुख कारण केजरीवाल सरकार खुद ही बता दिया है कि पुरानी शराब नीति सिर्फ 6 महीने के लिए ही रहेगा। ऐसे में सिर्फ 6 महीनों के लिए कोई भी ठेकेदार लाइसेंस के नाम पर करोड़ो खर्च करके क्यों ठेके खुलवाएगा?

दुकानदारों को हुआ नुकसान?

केजरीवाल की नई आबकारी नीति ठेकेदारों को कुछ खास रास नहीं आई। इसके कई कारण हो सकते हैं जिनमें एक प्रमुख कारण यह भी है कि जब पॉलिसी लागू किया गया था तो कॉमिशन बढ़ाकर 2.5 फिसदी से 12.5 फीसदी कर दिया गया था। इसके साथ ही सभी ठेकेदारों को अपनी प्राइस फिक्स कर बेचने की छूट दे दी गई। साथ ही कमाई का जरिया यह बना दिया गया जितना अधिक बिक्री उतना अधिक मुनाफा। इस चक्कर में अब ठेकेदार ही एक-दूसरे से अधिक बिक्री के चक्कर में मुफ्त वाले ऑफर और मनमाने तरह के दामों में बेचने का नतीजा हुआ कि ठेकेदारों को घाटा होने लगा। स्थित यह हुई कि 200 से अधिक शराब के ठेके तो खोले ही नहीं गए।

अब होगी शराब की किल्लत?

द‍िल्‍ली सरकार के इस फैसले के बाद अब माना जा रहा है क‍ि आने वाले कुछ द‍िनों में शराब की क‍िल्‍लत भी पैदा हो सकती है। दूसरी तरफ यह भी संभावना जताई जा रही है क‍ि लाइसेंसशुदा दुकानदार अपने स्‍टॉक को न‍िकालने के ल‍िए कोई ऑफर भी दे सकते हैं। नई पॉल‍िसी के तहत शराब बेचने का लाईसेंस 31 जुलाई तक वैल‍िड है। इसको दो बार बढ़ाया जा चुका है। ऐसे में अब शराब की दुकानों पर स्‍टॉक को खत्‍म करने के ल‍िए और अपने को क‍िसी नुकसान से बचाने के ल‍िए इस तरह का कोई कोम्‍बो ऑफर शराब के शौकीनों को द‍िया जा सकता है। इस तरह के ऑफर पहले भी एक्‍साइज व‍िभाग की ओर से पुराने स्‍टॉक को खत्‍म कराने के ल‍िए द‍िए गए हैं।

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