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दिल्ली में एक ही विपक्ष भाजपा फिर भी केजरीवाल का काट क्यों नहीं ढूंढ पा रही है

आदेश गुप्ता के दो सालों के कार्यकाल में पांच सीटों पर चुनाव हुए और सभी हार गई भाजपा

Losses in 6 seats during bypolls over two years, Delhi BJP leadership faces the heat
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दिल्ली और केजरीवाल, साल 2014 से जुड़ा दोनों का रिश्ता टूटने की जगह मजबूत होता जा रहा है। विपक्ष ने कई कोशिशें की लेकिन अरविंद केजरीवाल की ‘राजनीतिक दिवार’ को तोड़ने में नाकाम रही है। चाहे भाजपा के अध्यक्ष रहे मनोज तिवारी हो या तत्कालिन अध्यक्ष आदेश गुप्ता हो। भाजपा हमेशा से कहती रही है कि दिल्ली से कांग्रेस साफ हो चुकी है। ऐसे में अगर उसकी ही बात मान ली जाए तो दिल्ली में भाजपा ही एकलौती विपक्षी पार्टी है। लेकिन बावजूद उसके केजरीवाल का काट उसके पास नहीं है।

राजेन्द्र नगर उपचुनाव का नतीजा कई बातें और सवाल भाजपा के सामने लाकर खड़ी कर दी है। जिसमें पहली बात सामने आई है कि भाजपा स्थानीय कार्यकर्ताओं से जुड़ने में ‘विफल’ रही है और मतदाताओं तक सीधे पहुंचने के बजाय बैठकों और स्टार प्रचारकों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। राज्य के भाजपा नेताओं का जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ ‘सीधे जुड़ाव’ का अभाव है, क्योंकि उन्होंने उनसे मिलने या उनके मुद्दों को सुनने की कभी परवाह नहीं की।

भाजपा द्वारा दुर्गेश पाठक को बाहरी कहना और राजेश भाटिया को लोकल बताने की तरकीब का जादू दिल्लीवालों के ऊपर नहीं चला और दुर्गेश पाठक ने शानदार 11000 से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। सवाल यहां भाजपा नेतृत्व के ऊपर भी उठ रहा है। आदेश गुप्ता को पद संभाले दो वर्ष हुए और इस दौरान हुए पांच सीटों पर जिसमें चार निगम के और एक विधानसभा के उपचुनाव हुए जिसमें भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है। इसलिए कई लोगों का कहना है कि प्रदेश नेतृत्व के पास विजन की कमी है।

तीसरा और सबसे अहम सवाल भाजपा फिलहाल अंतरिम कलह की दौर से गुजर रही है जो विधानसभा उपचुनाव के पहले से ही चला आ रहा है। भाजपा के मीडिया प्रमुख रहे नवीन कुमार जिंदल और प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष राजन तिवारी के बीच एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया के सामने तू-तू मैं मैं को सबने देखा और फिर तब से ही दोनों में तनाव चला आ रहा था। ऐसा माना जाता है कि राजन तिवारी प्रदेश अध्यक्ष आदेश गुप्ता के बेहद खास हैं और पसंदीदा उपाध्यक्षों में से एक हैं, इसका प्रमाण अध्यक्ष के लगभग सभी कार्यक्रमों में राजन तिवारी का उपस्थित होने से समझा जा सकता है। इसलिए उस लड़ाई के बाद मीडिया प्रमुख नवीन कुमार जिंदल लगभग दिल्ली भाजपा के कई कार्यक्रमों से नदारद दिखें और फिर अंत में उनके द्वारा किया गया पैगंबर पर ट्वीट ने उनकी सदस्यता खत्म करा दी जिसको कई लोग राजन तिवारी के झगड़े से जोड़कर देखते हैं।

राजेन्द्र नगर में भाजपा की ओर से कई दावेदार थे। जिसमें खुद प्रदेश अध्यक्ष का भी नाम सामने आया लेकिन आदेश गुप्ता ने मीडिया के सामने इसे झूठ करार दिया। फिर दूसरा नाम वहां से विधायक रहें राष्ट्रीय प्रवक्ता सरदार आर पी सिंह का था जो टिकट ना मिलने से प्रदेश नेतृत्व से नाराज चलने लगे। इसके बाद राजन तिवारी का नाम भी लिस्ट में शामिल था जिसका प्रमाण वहां पर लगे कई होर्डिंग्स और पोस्टर थे। लेकिन जब नामों का ऐलान हुआ तो ये सभी दावेदारों का पार्टी से नाराज होने की खबर भी सामने आई। और शायद अंतरिम कलह के कारण ही भाजपा को उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

दिल्ली भाजपा चाहे जितने भी दावे कर लें चाहे जितना भी केजरीवाल सरकार के खिलाफ मुहिम चला दें, आरोप लगा दें लेकिन हकीकत यह है कि अभी तक सिर्फ अंधेरे में तीर चलाने जैसी कहानी ही हैं। भाजपा ने केंद्रीय मंत्रियों सहित 40 स्टार प्रचारकों का नाम ऐलान किया था लेकिन उसका भी कोई फायदा नहीं दिखा। अब गुजरात से प्रतिनिधिमंडल भी दिल्ली सरकार के बिजली, स्वास्थ्य एवं शिक्षा मॉडल को देखने आ रहा है ताकि पोल खोला जा सके जैसा केजरीवाल गुजरात में जाकर कर रहे हैं। हकीकत यही है कि अभी की जो स्थिति भाजपा की दिल्ली में है, उसपर मंथन करने की आवश्यकता है।

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