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Emergency 1975: भारतीय इतिहास की सबसे बदनुमा दाग ‘आपातकाल’ के पीछे की पूरी कहानी

1975: A State of Emergency was Declared in India
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नई दिल्ली, 25 जून। साल 1975, 26 जून की सुबह बाकी दिन की गर्मियों के जैसे ही थी। सब अपने काम में व्यस्त थे। तभी रेडियो पर आवाज सुनाई पड़ती है। भाइयों और बहनों राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है, इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है। आवाज तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की थी। ऐलान में भले ही आतंकित न होने की बात कही गई थी, लेकिन 25 जून की रात जो कुछ हुआ वह किसी आतंकी से कम नहीं। तत्का्लीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर राष्ट्र पति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल के आदेश पर हस्ताीक्षर कर दिए। नतीजा- देश के लोकतंत्र पर सबसे बदनुमा दाग। अगले 21 महीने नागरिक अधिकार छीन लिए गए, सत्तार के खिलाफ बोलना अपराध हो गया, विरोधी जेलों में ठूंस दिए गए। उन दिनों देश ने जबरन नसबंदी का भयावह दौर भी देखा।

यह इतना भयावह था कि आज भी लोग आपातकाल के कारणों का पता लगाने के लिए सोर्स का पता लगाते रहते हैं जिसके बाद कई सारे कारण सामने आते हैं। जिसमें एक चर्चा 12 जून का भी आता है। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव में गलत तौर-तरीके अपनाए। दोषी करार दी गईं इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया गया। बहुत लोग मानते हैं कि सत्ताई जाने के डर से इंदिरा ने इमरजेंसी लगा दी। हालांकि, उस दौर में इंदिरा के निजी सचिव रहे आर.के. धवन के अनुसार, इंदिरा तो इस्तीहफा देने को तैयार थीं। फिर ऐसा क्याज हुआ जो उन्हों ने आपातकाल को बेहतर विकल्पा समझा?

आपातकाल का प्लॉट तो साल 1971 की आम चुनाव में लिखना शुरु हो चुका था।। इंदिरा गांधी कांग्रेस की परपंरागत लोकसभा सीट रायबरेली से उम्मीदवार थी। उनके सामने थे समाजवादी आंदोलन से निकले राजनारायण। इंदिरा गांधी के पक्ष में जब जीत आई तो राजनारायण इससे संतुष्ट नहीं दिखें और उन्होंने उस समय के इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इंदिरा पर अनुचित तरीके से चुनाव जीतने का आरोप लगा दिया। केस तत्कालिन प्रधानमंत्री के ऊपर था, इसलिए इसकी चर्चा भी सिर्फ देश में ही नहीं विदेशों में भी हुई। मामला HC जज जगमोहन लाल सिन्हास की कोर्ट में गया। चार साल तक सुनवाई चली। उनपर काफी दबाव था। बैकडोर से बार-बार परेशान किए जाने पर सिन्हाई बिफर गए। रजिस्ट्रा र को फोन लगाकर कहा कि ऐलान कर दें, 12 जून 1975 को फैसला सुनाया जाएगा। साथ ही यह प्रतिबंध भी लगाया कि इसपर कोई ताली नहीं बजाएगा।

फिर क्या था 12 जून को जस्टिस सिंन्हा ने जब 258 पेज के फैसले को पढ़ना शुरु किया और उसमें एक लाइन पढ़ी कि याचिका स्वी कार की जाती है…। यह सिर्फ लाइन ही काफी थी पूरे देश में खलबली मचाने के लिए। जस्टिस सिन्हा ने भ्रष्ट आचरण के दो मानदंडों पर इंदिरा गांधी को दोषी ठहराया। पहला, पीएमओ में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (OSD) यशपाल कपूर का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में करना। कुछ ही देर में, एक सफदरजंग रोड (तत्काललीन पीएम आवास) पर इंदिरा के करीबियों की भीड़ जुटने लगी।

PM Indira Gandhi with West Bengal CM Siddhartha Shankar Roy

आरके धवन जो उस समय इंदिरा के बेहद करीब माने जाते थे। वे इंदिरा के निजी सचिव थे। 2015 के एक टीवी इंटरव्यूत में धवन ने दावा किया कि इमरजेंसी का विचार इंदिरा का नहीं, बल्कि उस वक्त पश्चिम बंगाल के सीएम रहे सिद्धार्थ शंकर रे का था। रे ने 8 जनवरी 1975 को ही पत्र लिखकर इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का सुझाव दिया था। अदालत का फैसला सुनने के बाद इंदिरा की पहली प्रतिक्रिया त्याागपत्र देने की थी। उन्होंदने इस्तीहफा टाइप भी करवा लिया था मगर उसपर कभी हस्तातक्षर नहीं किए।

WB CM Siddhartha Shanker Roy letter to then PM Indira Gandhi dated 8th Jan 1975, proposing the Imposition of Internal Emergency

अब इंटरव्यू में धवन द्वारा कही बातों को सही माने तो सवाल यह भी था कि आखिर इंदिरा पर कोई दवाब था जिससे उन्होंने अपना मन बदल लिया। दरअसल, अपना उत्ताराधिकारी चुनने को इंदिरा ने कांग्रेस की संसदीय पार्टी की बैठक बुलाई। जगजीवन राम ने अंतरिम प्रधानमंत्री चुनने के लिए इंदिरा के इस तरीके का विरोध किया। वह वोटिंग चाहते थे। यह बैठक बेनतीजा रही। राम के विरोध और वाई.बी. चव्हायण के साथ बढ़ती प्रतिद्वंदिता ने इंदिरा गांधी का मन बदल दिया।

Indira Gandhi with Other Congress Leaders


आपातकाल लगाने की स्थिति में पूरा मंत्रिमंडल मूकदर्शक बना रहा क्योंकि इंदिरा के खिलाफ जाने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई। इसका एक और कारण था कि सभी विपक्षी दलों को जेल में डाल दिया गया था। इसलिए एक डर का माहौल था कि अगर किसी ने कुछ कहा था शायद कुर्सी की जगह वे भी जेल की सलाखों के पीछे न हो। लिटन की दमनकारी नीतियों को अपनाते हुए इंदिरा गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता खत्म कर दी। मतलब प्रेस उनके खिलाफ कुछ नहीं लिख सकता था। इसके पीछे तर्क दिया गया कि देश की आम जनता इससे पैनिक हो जाएगी। इमरजेंसी से राजीव गांधी और सोनिया गांधी को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन यहां सबसे अहम रोल था मेनका गांधी के पति संजय गांधी की। क्योंकि कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने उन्हें उकसाया भी था।

इंमरजेंसी के और भी अन्य कारण थे जिसमें 25 जून 1975 को दिल्लीन के रामलीला मैदान से जेपी द्वारा इंदिरा को खूब सुनाए जाने का कारण भी प्रमुख रुप से था। खुद कांग्रेस के भीतर नेतृत्वज की खींचतान से इंदिरा पहले ही परेशान थी और उपर से जेपी द्वारा उनके लिए बुरा भला कहना उनके पद और व्यक्ति को नगावर गुजरा इसलिए उन्होंने इंमरजेंसी लगाकर सबको अंदर करवा दिया।

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