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अग्निपथ योजना के तहत अगर आपकी भर्ती होगी तो 4 साल बाद आपका क्या होगा?

आखिर सरकार अधिकतम उम्र सीमा 21 से बढ़ाकर 23 वर्ष करके क्या बताना चाहती है?

Agnipath age limit raised from 21 to 23 even as protests rage on
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अग्निपथ, केंद्र सरकार की एक ऐसी योजना जिसने पूरे देश में ‘अग्निकांड’ मचाए हुए हैं। चाहे दिल्ली हो, बिहार हो, उत्तर प्रदेश हो, मध्य प्रदेश हो या फिर अन्य कोई भी राज्य, हर जगह युवाओं की सिर्फ एक ही मांग है कि इस योजना को सरकार वापस लें। ट्रेनें जल रही हैं, थाना फूंक दिया जा रहा है, सरकारी संपतियों को आग के हवाले कर दिया गया, बच्चे सुसाइड तक कर लिए, लेकिन मोदी सरकार है कि इस योजना के फायदें गिनवाने में लगी हुई है। इतना ही नहीं जब पूरे देश में विरोध अपना उग्र रूप ले चुका है तो सरकार अधिकतम आयु सीमा 21 वर्ष से बढ़ाकर 23 वर्ष करने का फैसला ले लिया है। अब इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अधिकतम उम्र सीमा 23 करके सरकार उन युवाओं को खुश करना चाहती हैं जिनकी बार-बार यह शिकायत थी कि उनकी ओवर एज हो चुकी है। साथ ही इसमें अब भाजपा शासित राज्य सरकारें भी अपनी-अपनी तरफ से वरीयता और फायदा पहुँचाने की बात कर रही है।

केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 14 जून को जब इस योजना की घोषणा की होगी तब उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि इसको लेकर इतना बवाल होगा। इसके बाद पूर्वी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल केके रेप्सवाल ने बताया कि अग्निपथ योजना के तहत अगले तीन में महीने में यानि 24 जून से युवाओं की भर्ती शुरू हो जाएगी। इसके बाद उन्हें 10 हफ्ते से लेकर 6 महीने तक का प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रक्षिशण बाद उन्हें चार साल की सेवा के लिए भेजा जाएगा। सरकार ने इसको लेकर पहले ही पूरा रोड मैप तैयार कर लिया है। मतलब ये कि इतना सब कुछ होने के बावजूद सरकार इस योजना को वापस लेने के मूड में नहीं है। अभी तक तो इस अग्निकांड में सिर्फ सरकारी संपतियां, बसें, ट्रेनें, थाना, पुलिस चौकी इत्यादी जलाए जा रहे थे, लेकिन अब इससे होने वाले उपद्रव में छात्र की जान जा रही है या छात्रों के सुसाइट करने की खबर तक सामने आ रही हैं।

सवाल यह भी है कि जिस तरह से किसानों के लिए बनाए गए तीन कृषि कानून को वापस लेने में मोदी सरकार ने देरी करके जो गलती की, क्या उस गलती को दोबारा दोहराने तो नहीं जा रही है। पंजाब और दिल्ली के बॉर्डरों पर तो मोदी सरकार किसानों को खालिस्तानी बताकर कानून को वापस लेने में देरी करती रही लेकिन यहां तो लाखों युवाओं की ज़िंदगी का सवाल है। और सवाल यह भी है कि क्या सरकार चार साल देश की सेवा के लिए जिन युवाओं को अग्निपथ योजना के अंतर्गत भर्ती करेगी, उनके अंदर देश के प्रति वह वाफादारी, सेवार्थ भाव रहेगा जो एक सेना के जवान के अंदर होता है। क्योंकि अग्निपथ योजना के अंतर्गत भर्ती होने वाले जवान की मानसिकता बिल्कुल अलग होगी। उन्हें तो प्रतिदिन अपने भविष्य की चिंता सताएगी कि चार साल बाद उनका क्या होगा। क्या वे उन 25 फीसदी जवानों में आ पाएंगे या नहीं जो स्थायी होंगे। इस मानसिकता के साथ कोई देश सेवा कैसे करेगा या देश की सीमा पर सुरक्षा के दौरान अपनी प्राणों की आहूति क्यों करेगा। द्वितरफा सुसाइड हो गया कि एक ओर करियर के साथ समझौता और दूसरी ओर ज़िदगी का कोई ठीकाना नहीं।

केंद्र ने जो ऐलान किया है उसके अनुसार इस योजना के तहत हर साल करीब 45 हजार युवाओं को सेना में शामिल किए जाने की बात चल रही है। ये भर्तियां मेरिट और मेडिकल टेस्ट के आधार पर की जाएंगी। इन चार वर्षों में अग्निवीरों को 6 महीने की बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग दी जाएगी और साथ ही दिए जाएंगे 30 हजार से 40 हजार रुपये प्रतिमाह सैलरी। इन दौरान अग्निवीर तीनों सेनाओं के स्थायी सैनिकों की तरह अवॉर्ड, मेडल और इंश्योरेंस कवर पाएंगे। 48 लाख रुपये का बीमा कवर मिलेगा। अगर सेवा के दौरान शहीद या दिव्यांग हो गए, तो 44 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाएगा। चार साल बाद जो अग्निवीर बाहर होंगे उन्हें सेवा निधि पैकेज के तहत टैक्स फ्री करीब 12 लाख रुपये एकमुश्त मिलेंगे।

अब छात्रों का एक सवाल यह भी है कि 17 से 21 तक किसी भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने का एक पीक टाइम होता है। इसके बाद फॉर्म भरकर और साथ में तैयारियों का सिलसिला चलता है जो 26 से 27 साल तक जाता है, लेकिन डिफेंस में वो भी नहीं। चार साल की नौकरी और 12 लाख रुपये को लेकर छात्रों की ज़िदगी से खेलवाड़ होगा और कुछ नहीं। इसलिए छात्र इसका विरोध करने में लगे हुए हैं। साथ ही पिछले दो सालों में नौकरियां आई नहीं और जो आई वह आधी अधूरी स्थिति में पड़ी हुई है।

एक डिफेंस ही ऐसा क्षेत्र था जो पूरी तरह से फेयर था और उसकी विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं खड़ा हो रहा था लेकिन मोदी सरकार के एक फैसले के बाद इसपर भी सवाल उठना शुरु हो गया है। भाजपा शासित प्रदेश सरकारों ने इसे सही बताते हुए अपने राज्यों में वरीयता देने की बात कहने लगी हैं। बहुत से मंत्रालयों और राज्य सरकारों ने यह इच्छा व्यक्त की है कि उनके मंत्रालयों, कॉरपोरेशनों में अगर कोई भर्ती आती है जो उन्हें इसमें प्राथमिकता दी जाएगी। गृह मंत्रालय ने इस योजना में 4 साल पूरा करने वाले अग्निवीरों को CAPFs और असम राइफल्स में भर्ती में प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है तो उत्तर प्रदेश सरकार यूपी पुलिस और अन्य संबंधित सेवाओं में प्राथमिकता देने की बात कह रही है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने भी इसमें सहायता के लिए हामी भरी है। जबकि असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा भी असम आरोग्य निधि पहल में प्राथमिकता देने की बात कह रहे हैं।

राजनीतिकरण के आधार पर अगर सोचा जाए तो आज जिन प्रदेश सरकारों ने प्राथमिकता देने की बात कही है, वे सभी भाजपा शासित सरकारें हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की योजनाओं को बढ़ावा देना उनका काम भी है और राजनीति परिपेक्ष्य में सही भी। लेकिन राजनीतिकरण का शिकार युवा ना हो जाए यह सबसे बड़ा सवाल है। आज अगर अग्निवीरों को नौकरी मिल भी जाए और चार साल बाद जो राज्य सरकारें आज प्राथमिकता देने की बात कर रही हैं, अगर उनकी सरकार बदल जाए तो फिर उन चार साल तक देश की सेवा देने वाले जवानों का क्या होगा अगर बदली हुई राज्य सरकारें उन्हें अपने राज्यों की पुलिस बल में जगह देने से इंकार कर दें तो फिर छात्रों का क्या होगा।

आखिर सरकार को इतने विरोध के बाद भी इस अग्निपथ योजना को लागू करने की मजबूरी क्यों है? इस सवाल का जवाब अगर ढूंढा जाए तो इसे कुछ आंकड़ों के सहारे समझा जा सकता है। देश में फिलहाल जो सेना की स्थिति है तीनों सेनाओं में अब भी करीब एक लाख से ज्यादा पद खाली हैं। सेना में तो कोरोना के कारण दो साल से भर्ती ही नहीं हुई। इसी साल 21 मार्च को राज्यसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया था कि 2020-21 और 2021-22 में कोरोना के कारण सेना में भर्ती नहीं हुई है। लेकिन इसी दौरान नौसेना में 8,319 और वायु सेना में 13,032 भर्तियां हुईं हैं।

पिछले साल 13 दिसंबर को रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने राज्यसभा में तीनों सेनाओं में अफसरों और जवानों की कमी की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि सेना में 53,569 अफसर और 11.35 लाख जवान मौजूद हैं। अभी भी अफसरों के 7,476 और जवानों के 97,177 पद खाली हैं। इसी तरह वायुसेना में 12,048 अफसर और 1.38 लाख एयरमैन हैं। अभी भी वायुसेना में 621 अफसरों और 4,850 एयरमैन की जरूरत है। नौसेना में अफसरों के 11,100 पद हैं और अब भी 1,265 पद खाली हैं। इसी तरह से नौसेना में 63,515 नौसैनिक हैं और 11,166 नौसैनिकों की जरूरत और है।

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