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सांसद अनिल बलूनी की चौकसी आई काम, एक और भाजपाई विधायक को कांग्रेसी होने से रोका

विधानसभा चुनाव से चंद महीनों पहले उत्तराखंड की राजनीति में दलबदल का सियासी खेल अपने पूरे चरम पर है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव से चंद महीनों पहले एक दूसरे के नेताओं को अपने पाले में मिलाने के लिए भाजपा-कांग्रेस में ‘जोरआजमाइश’ लगी हुई है। इसकी शुरुआत भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दिनों की थी। भाजपा ने अब तक कांग्रेस के एक व दो निर्दलीय विधायकों को पार्टी में शामिल करा चुकी है। बता दें कि गढ़वाल मंडल से कांग्रेस विधायक राजकुमार, निर्दलीय प्रीतम सिंह पवार के बाद कुमाऊं मंडल से निर्दलीय विधायक राम सिंह कैड़ा ने भाजपा का दामन थाम लिया था। ‘भाजपा के इस सियासी दांव के बाद अब कांग्रेस की बारी थी’। उत्तराखंड कांग्रेस के लिए सोमवार का दिन महत्वपूर्ण रहा। राज्य कांग्रेस के नेताओं ने भाजपा को ‘करारा जवाब’ देते हुए धामी सरकार में कैबिनेट मंत्री और राज्य के सबसे बड़े दलित नेताओं में शुमार कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य और उनके विधायक बेटे संजीव आर्य को दिल्ली ले जाकर कांग्रेस में शामिल करा लिया। लेकिन भाजपा दिल्ली में ऐनमौके पर एक विधायक को कांग्रेस में जाने से बचा ले गई। पूरा मामला अब आपको बताते हैं। ‘रविवार यानी 10 अक्टूबर को उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और चुनाव समिति के प्रभारी हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह और राज्य कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस मिशन को बहुत ही गुप्त रखा’। हरीश रावत प्रीतम सिंह और गोदियाल उत्तराखंड से रविवार को यशपाल आर्य और उनके बेटे संजीव आर्य के साथ देहरादून से लगी रायपुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक उमेश शर्मा काऊ को भी कांग्रेस में शामिल कराने ले गए थे। सोमवार सुबह करीब 9 बजे को यह सभी नेता राहुल गांधी से मिलने उनके दिल्ली स्थित आवास पहुंच गए। लेकिन उसी दौरान भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को ‘भनक’ लग चुकी थी। उन्होंने आनन-फानन में अपने भाजपा विधायक उमेश शर्मा काऊ को मोबाइल से संपर्क कर किसी बहाने से बुला लिया। लेकिन उस वक्त उमेश शर्मा राहुल गांधी हरीश रावत प्रीतम सिंह गोदियाल समेत अन्य नेताओं के बीच मौजूद थे। अनिल बलूनी के धामी सरकार में मंत्री बनाने के आश्वासन पर विधायक उमेश शर्मा तत्काल ‘बहाना’ बनाकर वहां से निकल गए। कुछ दूर पर ही अनिल बलूनी खड़े हुए थे उनके साथ उमेश शर्मा गाड़ी में सवार हो गए। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रीतम सिंह गणेश गोदियाल भाजपा विधायक उमेश शर्मा को तलाशते रहे। दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में यशपाल आर्य और उनके बेटे की कांग्रेस में घर वापसी इसी चक्कर में आधे घंटे देर से शुरू हुई। गौरतलब है कि यशपाल आर्य व उनके विधायक पुत्र संजीव पहले कांग्रेस में ही थे, वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले ही वह भाजपा में शामिल हुए थे।

यशपाल आर्य और उमेश शर्मा पिछले कुछ दिनों से नाराज चल रहे थे—

पूर्व कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य काफी समय से भाजपा से नाराज चल रहे थे। इसके साथ रायपुर भाजपा विधायक उमेश शर्मा काऊ करीब डेढ़ महीने पहले अपने विधानसभा क्षेत्र में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान ही अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं से हुई तकरार और बहस के बाद नाराज थे। वहीं यशपाल आर्य की नाराजगी दूर करने के लिए पिछले महीने सुबह-सुबह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उनके आवास पहुंच गए थे। ‘मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री धामी ने उन्हें मनाने की कोशिश भी की थी। लेकिन सीएम धामी की कोशिशें रंग नहीं ला पाई’। आपको बता दें कि यशपाल आर्य छह बार विधायक रह चुके हैं। यशपाल पूर्व में उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे हैं। यशपाल पहली बार 1989 में खटीमा सितारगंज सीट से विधायक बने थे। उत्तर प्रदेश के जमाने से विधायक बनते आ रहे यशपाल आर्य उत्तराखंड गठित होने के पांच साल विधानसभा अध्यक्ष, विजय बहुगुणा और हरीश रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे और सात साल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। दलित चेहरे के तौर पर कांग्रेस उनका सदुपयोग करती रही है। पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उत्तराखंड में साल 2022 में अपनी सरकार आने पर दलित मुख्यमंत्री बनाने का बड़ा बयान दिया था। यशपाल आर्य दलित वर्ग से आते हैं। संभव है उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का पार्टी आलाकमान की ओर से आश्वासन दिया गया हो? ‌ राज्य में यशपाल आर्य की दलित वर्ग में अच्छी पकड़ मानी जाती है। कांग्रेस के इस सियासी दांव के बाद फिलहाल भाजपा भी चुप नहीं बैठने वाली। भाजपा के राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी कई कांग्रेस विधायकों को अपने पाले में लाने का दावा कर रहे हैं। वहीं हरीश रावत, प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल भी भाजपा के बड़े नेताओं को कांग्रेस में मिलाने के लिए एलान कर चुके हैं। ‌चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस में दलबदल का खेल और भी देखने को मिल सकता है। राज्य के इस तरह के सियासी हालात से आने वाले समय में चुनाव बेहद दिलचस्प हो जाएंगे।

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