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Tragic: Legendary sprinter Milkha Singh Passes Away

नहीं रहे फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह, 91 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

Tragic: Legendary sprinter Milkha Singh Passes Away
Tragic: Legendary sprinter Milkha Singh Passes Away

स्वतंत्र भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह का निधन 91 वर्ष में कोरोना से हो गया। मिल्खा सिंह आज से एक महीने पहले 19 मई को कोरोना संक्रमित हुए थे जिसके बाद उन्हें 24 मई को मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मिल्खा सिंह के बाद 26 मई को उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह (85) भी संक्रमण के चलते इसी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। परिवार के आग्रह पर मिल्खा सिंह को 30 मई को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी और वे अपने घर पर ही थे। शुक्रवार अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया था, जहाँ देर रात करीब 11.30 बजे फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

20 नवंबर 1929 को पाकिस्तान के गोविंदपुरा में जन्मे मिल्खा सिंह का जीवन संघर्षों से भरा रहा। बचपन में भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दर्द और अपनों को खोने का दर्द ने उन्हें बेहद मजबूत बना दिया था। मिल्खा सिंह ने भारत पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान एक ट्रेन की महिला बोगी में सीट के नीचे छिपकर दिल्ली पहुंचने, शरणार्थी शिविर में रहने और ढाबों पर बर्तन साफ कर उन्होंने जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की। इसके बाद उन्होंने सेना में भर्ती होकर एक धावक के रूप में पहचान बनाई। 
मिल्खा सिंह ने अपनी 80 अंतरराष्ट्रीय दौड़ों में उन्होंने 77 दौड़ें जीतीं, लेकिन उन्हें रोम ओलंपिक का मेडल हाथ से जाने का गम उन्हें जीवन भर रहा। उनकी आखिरी इच्छा थी कि वह अपने जीते जी किसी भारतीय खिलाड़ी के हाथों में ओलंपिक मेडल देखें लेकिन अफसोस उनकी अंतिम इच्छा उनके जीते जी पूरी न हो सकी। हालांकि मिल्खा सिंह की हर उपलब्धि इतिहास में दर्ज रहेगी और वह हमेशा हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे।

मिल्खा सिंह की उपलब्धियां:

  • 1958 में भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा था
  • 2001 में भारत सरकार द्वारा अर्जुन पुरस्कार देने की पेशकश की गई, जिसे मिल्खा सिंह ने ठुकरा दिया था।

धावक के तौर पर करिअर

  • 1956: मेलबोर्न में आयोजित ओलंपिक खेलों में 200 और 400 मीटर रेस में भारत का प्रतिनिधित्व किया
  • 1958: कटक में आयोजित राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने 200 और 400 मीटर दौड़ में राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किया।
  • एशियन खेलों में भी इन दोनों प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक हासिल किया। वर्ष 1958 में उन्हें एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली, जब उन्होंने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मीटर प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। इस प्रकार वह राष्ट्रमंडल खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले स्वतंत्र भारत के पहले धावक बन गए।
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