मंगलवार, अगस्त 9Digitalwomen.news

बंगाल चुनाव में भाजपा अपने ही राजनीतिक दांव में उलझ कर रह गई–

बंगाल में भाजपा ने ध्रुवीकरण का दांव खेला। हिंदू वोटों को लामबंद करना, पिछड़ों-दलितों को साथ लेना और टीएमसी के सेनापतियों को तोड़कर उसे एक डूबता हुआ जहाज साबित करना उन्हें उम्मीद थी कि वाम और कांग्रेस का गठबंधन अगर अपना पुराना प्रदर्शन भी दोहरा लेगा और ‘हिंदू ध्रुवीकरण’ हो पाएगा तो चुनाव के रण में चमत्कार संभव है। लेकिन ऐसा साफ नजर आ रहा है कि ‘भाजपा अपने ही राजनीतिक दांव में उलझ गई’। ये लहर थी हिंदू ध्रुवीकरण के खिलाफ मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष या भाजपा को पसंद न करने वाले हिंदुओं के ध्रुवीकरण की वहीं ‘मुसलमानों का 75 प्रतिशत से ज्यादा वोट किसी और पार्टी को न जाकर टीएमसी में शिफ्ट हो गया’। बाकी का हिंदू वोट तो टीएमसी को मिला ही शायद यह अरसे बाद ही है कि राज्य में अगड़ी जातियां और मुसलमान भाजपा के खिलाफ लामबंद दिखाई दिए। दूसरी ओर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की ‘उग्रता, आक्रामकता’ और ममता का बंगाली अस्मिता का दांव, अकेले एक पूरी फौज से लड़ने का साहस और सहानुभूति, ऐसे कितने ही कारक चुनाव में भाजपा या मोदी की लहर के खिलाफ खुद एक लहर बनकर खड़े हो गए। भाजपा के पास न तो मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा था और न ही कोई तेजतर्रार महिला नेता जो ममता को उनकी शैली में जवाब दे पाता। भाजपा की भारी-भरकम चुनावी मशीनरी का अकेले मुकाबला कर रहीं ममता का नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान घायल हो जाना भी निर्णायक बातों में एक रहा। ममता बनर्जी ने चोट के बावजूद ‘व्हील चेयर’ से ही जिस तरह से लगातार धुआंधार प्रचार किया और भाजपा नेतृत्व के खिलाफ आक्रामक हमला बोला, उससे यह छवि बनी कि ‘घायल शेरनी’ ज्यादा मजबूती से मोर्चा संभाले हुए हैं। ऐसे में सहानुभूति की फैक्टर भी उनके पक्ष में गया। भाजपा एक ऐतिहासिक सफलता के बाद भी विपक्ष तक सीमित हो गई है। इसकी सबसे बड़ी कीमत वामदलों और कांग्रेस ने चुकाई है जो राज्य से साफ हो गए हैं। ममता 10 साल के शासन के बाद फिर पश्चिम बंगाल की गद्दी संभालने जा रही हैं। पलस्तर कट गया है, ममता अपना पैर आगे बढ़ा चुकी हैं। बंगाल में 292 सीटों के लिए हुए चुनाव में टीएमसी ने 200 से अधिक सीटों पर कब्जा जमा लिया है। वहीं भाजपा करीब 75 सीटों पर जीत हासिल कर सकी।

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