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Sharad Purnima (शरद पूर्णिमा विशेष): धरती पर बरसता है अमृत, शरद पूर्णिमा की रात खीर खाने की रही है परंपरा

Sharad Purnima
Sharad Purnima

आज शरद पूर्णिमा है। यानी चांदनी उत्सव। आसमान में एक ऐसा नजारा जिसे बिना देखे रहा नहीं जा सकता है । इस रात का लोगों को पूरे साल इंतजार रहता है । शरद पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। आज बात शरद पूर्णिमा पर चांदनी उत्सव की होगी । अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। बता दें कि एक वर्ष में 12 पूर्णिमा होती हैं, लेकिन शरद पूर्णिमा का विषेश महत्व माना गया है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करती हैं । जो भी मनुष्य शरद पूर्णिमा की रात्रि को जागरण करता है, मां लक्ष्मी उससे प्रसन्न होती हैं। इसलिए इस पूर्णिमा का विशेष महत्व माना गया है । इस रात चंद्रमा अपने पूरे यौवन पर रहता है, चांदनी पूरी रात उत्सव करती है। आसमान से बरसते अमृत के बीच हमारे देश में खीर खाने की सदियों पुरानी परंपरा रही है। इस दिन से शीत ऋतु की शुरुआत भी होती है । मान्यता है कि शरद पूर्णिमा का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसे कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि यही वो दिन है जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है। धार्मिक मान्यता है कि श्री हरि विष्णु के अवतार भगवान श्रीकृष्ण ने 16 कलाओं के साथ जन्म लिया था, जबकि भगवान राम के पास 12 कलाएं थीं। इस पर्व की शुरुआत शाम 5.45 बजे से होगी। इस दिन मध्य रात्रि में अश्विनी नक्षत्र शुरू होगा, इसके साथ अमृतसिद्धि का योग भी बन रहा है ।

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा, मां लक्ष्मी और विष्णु की पूजा का है विधान—-

इस रात चंद्रमा, माता लक्ष्मी और विष्णु की पूजा का विधान है। कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति शरद पूर्णिमा के दिन रात में जगा होता है मां लक्ष्मी उन्हें उपहार देती हैं। माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन ही मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इस वजह से देश के कई हिस्सों में इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जिसे ‘कोजागरी लक्ष्मी पूजा’ के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को कौमुदी व्रत भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जो विवाहित स्त्रियां इसका व्रत करती हैं उन्हें संतान की प्राप्ति होती है। जो माताएं इस व्रत को रखती हैं उनके बच्चे दीर्घायु होते हैं। शरद पूर्णिमा का चमकीला चांद और साफ आसमान मानसून के पूरी तरह चले जाने का प्रतीक है। माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा के प्रकाश में औषधिय गुण मौजूद रहते हैं जिनमें कई असाध्य रोगों को दूर करने की शक्ति होती है। इस रात जागने वाले व्यक्ति को मां लक्ष्मी उपहार भी देती हैं । साथ ही शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर उसे आकाश के नीचे रखा जाता है। फिर 12 बजे के बाद उसका प्रसाद ग्रहण किया जाता है। माना जाता है कि इस खीर में अमृत होता है और यह कई रोगों को दूर करने की शक्ति रखती है।

मान्यता है कि इस रात कृष्ण की बजाई बांसुरी पर गोपियां खींची चली आईं थी—

शरद पूर्णिमा पर भगवान श्रीकृष्ण के मंदिराें गर्भगृह में शरद का खाट सजाया जाता है। खाट पर चौसर और शतरंज की झांकी भी सजाई जाती है। चंद्रमा की शीतल चांदनी में रखी खीर का भोग भी ठाकुरजी को अर्पण किया जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के मुताबिक शरद पूर्णिमा के दिन भगवान कृष्ण ने ऐसी बांसुरी बजाई कि उसकी जादुई ध्वनि से सम्मोहित होकर वृंदावन की गोपियां उनकी ओर खिंची चली आईं। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण ने उस रात हर गोपी के लिए एक कृष्ण बनाया। पूरी रात कृष्ण गोपियों के साथ नाचते रहे, जिसे ‘महारास’ कहा जाता है। मान्यता है कि कृष्ण ने अपनी शक्ति के बल पर उस रात को भगवान ब्रह्म की एक रात जितना लंबा कर दिया। ब्रह्मा की एक रात का मतलब मनुष्य की करोड़ों रातों के बराबर होता है।

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