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Shardiya Navratri 2020 First day: Maa Shailputri Puja Timing,Vidhi,Samgri and Aarti

आज से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ ,जानें कैसे करें मां शैलपुत्री की पूजा एवं शुभ मुहूर्त

Navratri 2020: Maa Shailputri

आज से शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व का शुभ आरंभ हो चुका है।
मां दुर्गा की उपासना की यह महापूजा 17 अक्टूबर से 25 अक्तूबर तक मनाया जाएगा। नवरात्रि के पहले दिन से जहां मां की पूजा होती है वहां कलश यानी घटस्थापना की जाती है और पूजा के आखिरी दिन कन्या पूजन करके व्रत का समापन किया जाता है। नौ दिनों तक नौ स्वरूपों में पूजी जाने वाली मां दुर्गा हर बार एक नए सवारी पर सवार होकर आती हैं जिसका अलग ही महत्व होता है। इस बार मां दुर्गा कई विशिष्ट योग-संयोग के साथ अश्व पर सवार होकर अपने मंडप में विराजमान होंगी।
यह शुभ योग 1962 के बाद 58 साल के अंतराल पर होगा। यह संयोग अच्छे कार्यों के लिए दृढ़ता लाने में बलवान होगा।इस नवरात्रि पर राजयोग, द्विपुष्कर योग, सिद्धियोग, सर्वार्थसिद्धि योग, सिद्धियोग और अमृत योग जैसे संयोगों का निर्माण हो रहा है। इस नवरात्रि दो शनिवार भी पड़ रहे हैं।

पूजा का शुभ योग :
शुभ समय – सुबह 6:27 से 10:13 तक ( विद्यार्थियों के लिए अति शुभ)

अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 11:44 से 12:29 तक ( सर्वजन)

स्थिर लग्न ( वृश्चिक)- प्रात: 8.45 से 11 बजे तक ( शुभ चौघड़िया, व्यापारियों के लिए श्रेष्ठ)

कैसे करें पूजा:
सुबह ब्रहम मुहूर्त में उठकर स्नान करें।

घर के किसी पवित्र स्थान पर स्वच्छ मिटटी से वेदी बनाएं।

वेदी में जौ और गेहूं दोनों को मिलाकर बोएं।

वेदी के पास धरती मां का पूजन कर वहां कलश स्थापित करें।

इसके बाद सबसे पहले प्रथमपूज्य श्रीगणेश की पूजा करें।

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच लाल आसन पर देवी मां की प्रतिमा स्थापित करें।

माता को कुंकुम, चावल, पुष्प, इत्र इत्यादि से विधिपूर्वक पूजा करें।

नवरात्रि के प्रथम देवी मां शैलपुत्री की पूजा होती है। शैलपुत्री का अर्थ होता है ‘पर्वत की बेटी’।
मां शैलपुत्री के स्वरूप की बात करें तो मां के माथे पर अर्ध चंद्र स्थापित होती है ,दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल का फूल। वे नंदी बैल की सवारी करती हैं और पर्वतों में विराजती हैं।
मां शैलपुत्री को सफेद चीज हैं पसंद
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री को सफेद चीज पसंद है। इस दिन सफेद चीजों का भोग लगाया जाता है और अगर यह गाय के घी में बनी हों तो व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है।

प्रथम देवी शैलपुत्री वंदना मंत्र:
वन्दे वाञि्छतलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ||

स्त्रोत पाठ:
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

मां शैलपुत्री से जुड़ी पौराणिक कथा
मां दुर्गा अपने पहले स्वरुप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से पूजी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शंकर जी से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया किन्तु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया।
देवी सती ने जब सुना कि हमारे पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं,तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने भगवान शिव को बताई। भगवान शिव ने कहा-”प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं,अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।” शंकर जी के इस उपदेश से देवी सती का मन बहुत दुखी हुआ। पिता का यज्ञ देखने वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर शिवजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी।
सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने ही स्नेह से उन्हें गले लगाया। परिजनों के इस व्यवहार से देवी सती को बहुत क्लेश पहुंचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहां भगवान शिव के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है,दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का ह्रदय ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा कि भगवान शंकर जी की बात न मानकर यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।वह अपने पति भगवान शिव के इस अपमान को सहन न कर सकीं, उन्होंने अपने उस रूप को तत्काल वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया।
वज्रपात के समान इस दारुणं-दुखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया। सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वह शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। पार्वती,हेमवती भी उन्हीं के नाम हैं। इस जन्म में भी शैलपुत्री देवी का विवाह भी शंकर जी से ही हुआ।

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