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Tributes to ‘Gurdev’ “Rabindranath Tagore” on his 79th death anniversary – राष्ट्रगीत रचयिता एवं नोबेल विजेता “गुरुदेव” रवींद्रनाथ ठाकुर” को 79वीं पुण्यतिथि पर नमन…

Tributes to Gurdev #RabindranathTagore on his death anniversary

महान साहित्यकार एवं रचनाकार रबींद्रनाथ ठाकुर की आज 79वीं पुण्यतिथि है। रबींद्रनाथ टैगोर को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। 7 अगस्त 1941 को उन्होंने इस संसार को त्याग दिया। टैगोर एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। टैगोर ने कविता, साहित्य, दर्शन, नाटक, संगीत और चित्रकारी समेत कई विधाओं में प्रतिभा का परिचय दिया ।

गीतांजलि के लिए टैगोर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। 1913 में साहित्य में नोबेल जीतने वाले वे पहले एवं अकेले भारतीय नागरिक हैं।

रबिन्द्रनाथ ठाकुर ने ही “मोहन दास करमचंद गांधी” को “महात्मा” की उपाधि दी थी। कई बार ऐसा हुआ है जब दोनों के बीच कई विषयों को लेकर अलग राय होती थी,लेकिन टैगोर का दृष्टिकोण हमेशा तार्किक ज्यादा होता था। टैगोर “महात्मा गांधी” का बहुत सम्मान करते थे।

टैगोर की जीवनी

गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्‍म 7 मई सन् 1861 को कोलकाता में हुआ था। वे अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे। बचपन में उन्‍हें प्‍यार से ‘रबी’ बुलाया जाता था। आठ वर्ष की उम्र में उन्‍होंने अपनी पहली कविता लिखी, सोलह साल की उम्र में उन्‍होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था।

अपने जीवन में उन्‍होंने एक हजार कविताएं, आठ उपन्‍यास, आठ कहानी संग्रह और विभिन्‍न विषयों पर अनेक लेख लिखे। इतना ही नहीं रवींद्रनाथ टैगोर संगीतप्रेमी थे और उन्‍होंने अपने जीवन में 2000 से अधिक गीतों की रचना की। भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधिनायक’ उन्हीं की रचना है। इतना ही नहीं बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी उन्हीं की रचना है। यहां तक कि श्रीलंका के राष्ट्रगान को भी उनकी कविता से प्रेरित माना जाता है।

“गीतांजलि” से “नोबेल” तक का सफर

जीवन के 51 वर्षों तक उनकी सारी उप‍लब्धियां और सफलताएं केवल कोकाता और उसके आसपास के क्षेत्र तक ही सीमित रही। 51 वर्ष की उम्र में वे अपने बेटे के साथ इंग्‍लैंड जा रहे थे। समुद्री मार्ग से भारत से इंग्‍लैंड जाते समय उन्‍होंने अपने कविता संग्रह गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद करना प्रारंभ किया। आपकी जानकर आश्चर्य होगा कि गीतांजलि का अनुवाद करने के पीछे उनका कोई उद्देश्‍य नहीं था, केवल समय ब्यतीत करने के लिए उन्‍होंने गीतांजलि का अनुवाद करना प्रारंभ किया। उन्‍होंने एक नोटबुक में अपने हाथ से गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद किया।

उसके बाद तोह और भी अजीब घटना घटी ,जब वे लंदन पहुंचे तो उनका पुत्र उस सूटकेस को लाना ही भूल गया जिसमें वह नोटबुक रखी थी। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था , उन्होंने इस ऐतिहासिक कृति की नियति को किसी बंद सूटकेस में लुप्‍त होना नहीं लिखा था। वह सूटकेस जिस व्‍यक्ति को मिला उसने स्‍वयं उस सूटकेस को रबीन्द्रनाथ टैगोर तक अगले ही दिन पहुंचा दिया।

वही लंदन में टैगोर के अंग्रेज मित्र चित्रकार रोथेंस्टिन को जब यह पता चला कि गीतांजलि को स्‍वयं रवींद्रनाथ टैगोर ने अनुवादित किया है तो उन्‍होंने उसे पढ़ने की इच्‍छा जाहिर की। गीतांजलि पढ़ने के बाद रोथेंस्टिन पर मानो उसका जादू चल गया, वे इतने प्रभावित हुए की उन्‍होंने अपने मित्र डब्‍ल्‍यू.बी. यीट्स को ‘गीतांजलि’ के बारे में बताया और वहीं नोटबुक उन्‍हें भी पढ़ने के लिए दी। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास के स्वर्णिम पन्नो में दर्ज है। यीट्‍स ने स्‍वयं गीतांजलि के अंग्रेजी के मूल संस्‍करण का प्रस्‍तावना लिखा। सितंबर सन् 1912 में गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद की कुछ सीमित प्रतियां इंडिया सोसायटी के सहयोग से प्रकाशित की गई।

लंदन के साहित्यिक गलियारों में इस किताब की खूब सराहना हुई। जल्‍द ही गीतांजलि ने संपूर्ण विश्‍व को सम्‍मोहित कर लिया। पहली बार भारतीय सहत्या की झलक पश्चिमी जगत ने देखी और सिर्फ देखी नहीं, सराहा भी । गीतांजलि के प्रकाशित होने के एक साल बाद सन् 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर को नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया। टैगोर सिर्फ महान रचनाकार ही नहीं थे, बल्कि वो पहले ऐसे इंसान थे जिन्होंने पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के मध्‍य सेतु बनने का कार्य किया था। टैगोर केवल भारत के ही नहीं समूचे विश्‍व के साहित्‍य, कला और संगीत के एक महान साहित्यकार एवं रचयिता हैं, वे उस प्रकाशपुंज की तरह हैं जो साहित्य की दुनिया मे हमेशा प्रकाशमान रहेंगे एवं आने वाले अनन्त समय तक साहित्य जगत एवं सभी साहित्यकारों/रचनाकारों को अपनी “साहित्य” रूपी रोशनी से मार्गदर्शन देने का कार्य करेंगे।

आज हम सभी उनकी 79वीं पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धांजलि देते हुए श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

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