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बाढ़ और बदहाल ‘ बिहार ‘…

Flood In Bihar

बिहार और बाढ़ का संबंध ऐसा है जैसे रात के साथ दिन का।

कोरोना के इस दौर में भले ही आपके घर में अतिथि ना आए हों लेकिन बिहार में बाढ़ जरूर आया है, क्यों कि शायद इसके लिए यहां राज करने वाले सरकार ने अब तक लॉक डाउन लगाने की कोशिश ही नहीं कि।
हर साल बिहार में बाढ़ लगभग 15 जिले से अधिक जिलों पर अपना कहर बरपा कर जाती है जिस से 20 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित होते है। जैसे ही जुलाई का महीना शुरू होता है एक तरफ लोग अपने खेतों में धान की रोपनी करने लग जाते हैं तो दूसरी तरफ लोग बाढ़ से बचने के लिए जान माल समेटने लगते हैं। बरसात के शुरू होते ही बाढ़ का संकट उत्तरी बिहार पर मंडराना शुरू हो जाता है और फिर तीन महीने की तबाही, इन क्षेत्र के गरीबों की पूरे साल की मेहनत की कमाई पर पानी फेर चला जाता है।

राज्य में हर साल नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र यानी उत्तर बिहार के कई जिलों में जैसे अररिया, किशनगंज, फारबिसगंज, पुर्णिया, सुपौल, मधुबनी, दरभंगा, कटिहार जैसे कई जिलों में कोसी, कमला, बागमती, गंडक, महानंदा समेत उत्तर बिहार की तमाम छोटी बड़ी नदियों का पानी का बहाव इतना तेज हो जाता है कि इन तटबंधों के किनारे बसे सैकडों गांव जलमग्न हो जाते है।
बिहार में बाढ़ कब से आ रही है इसका कोई पता नहीं, लेकिन भारत के आज़ाद होने के बाद पहली बार 1953-54 में बाढ़ को रोकने के लिए एक परियोजना शुरू की गई थी जिसका नाम दिया गया ‘कोसी परियोजना’ ,जिसके नाम पर हर साल राज्य में पैसे जरूर आते है, हां लेकिन काम क्या होता है इसका अनुभव शायद ही किसी बाढ़ प्रभावित इलाकों को हुआ हो।

1953 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा शुरू हुई इस परियोजना के शिलान्यास के समय यह कहा गया था कि अगले 15 सालों में बिहार की बाढ़ की समस्या पर क़ाबू पा लिया जाएगा लेकिन ऐसा आज तक देखने को नहीं मिला।
इसके बाद 1955 में देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने कोसी परियोजना के शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान सुपौल के बैरिया गांव में सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि, “मेरी एक आंख कोसी पर रहेगी और दूसरी आंख बाक़ी हिन्दुस्तान पर.”
1965 में लाल बहादुर शास्त्री द्वारा कोसी बराज का उद्घाटन किया गया। बैराज बना कर नेपाल से आने वाली सप्तकोशी के प्रवाहों को एक कर दिया गया और बिहार में तटबंध बनाकर नदियों को मोड़ दिया गया।

इस परियोजना के तहत समूचे कोसी क्षेत्र में नहरों को बनाकर सिंचाई की व्यवस्था की गई, और कटैया में एक पनबिजली केंद्र भी स्थापित हुआ जिसकी क्षमता 19 मेगावॉट बिजली पैदा करने की है लेकिन बाढ़ की परेशानी ज्यों की त्यों आज भी बनी है। बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी आज भी अपने उफान से सैकड़ों घरों को तबाह कर जाती है।

राज्य में हर साल बाढ़ के नाम से कई बचाव और कटाव निरोधक कार्यों के लिए राज्य सरकार की और से मंजूरी दी जाती है। पिछले साल ही राज्य सरकार ने 395 योजनाओं को मंजूरी दी थी और इस पर 1530 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इनमें बाढ़ सुरक्षा की 859 करोड़ की 13 विशेष योजनाएं अलग से शामिल की गई थीं। राज्य बाढ़ नियंत्रण पर्षद की 54वीं राज्य योजना के तहत 573 करोड़ की 316 योजनाएं शामिल की गई थी। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार की 50-50 फीसदी सहभागिता से चलने वाली बाढ़ प्रबंधन योजनाएं भी बनाए गए थे जिस पर पर 471 करोड़ की धनराशि खर्च हुए। लेकिन हर साल की तरह इस साल भी फिर से बाढ़ बिहार में अपना प्रकोप दिखा रही है। बरसात के पहले ही महीने में हजारों लोग इस साल फिर से बेघर हो चुके है।

राज्य सरकार हर साल बाढ़ के नाम पर नए योजनाओं के साथ बेघर हुए लोगों के घावों पर मरहम लगाने पहुंच जाती है और कुछ कैम्प और 10,12 राहत शिविर लगा कर अपना पल्ला झाड़ लेती है । हर साल जाने क्यों ऐसा लगता है कि मानो बाढ़ यहां के लोगों की नियति बन चुकी है।

बाढ़ से वैसे लोग शायद ही प्रभावित होते हैं जिनके पास प्रयाप्त संसाधन होते हैं, या जो दूसरी जगहों पर घर बसाने में समर्थवान होते हों बल्कि असर उनके जीवन पर होता है जो रोजी रोटी के लिए अपने खेतों पर निर्भर होते हैं।
माना बाढ़ प्राकृतिक आपदा है लेकिन इस से प्रभावित बिहार के लगभग 50 प्रतिशत लोग होते हैं। 1950 में राज्य के गठन के बाद हर साल सत्ता में रहने वाली सरकार इस से बचने के लिए इसके वैकल्पिक समाधान का लॉली पॉप पकड़ा देती है,ताकि एक साल तक फिर से लोग चुप रहें और फिर चुनाव में वहीं वादों के साथ वोट मांगने आए जाती है जो पिछले 5 साल के कार्य काल में पूरे ना करती है। फिर क्या फिर ? जनता तो है कि बेवकूफ!

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