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The Death of Humanity : Killing a Innocent Pregnant Elephant is a Cruelty…

हैवानियत की सारी हदें पार करता मनुष्य…

साक्षरता के दर में 93 प्रतिशत लाने वाला राज्य आज मानवता के दर में शून्य साबित हुआ।
केरल जहां की शैक्षिक गुणवत्ता भारत में सबसे आगे माना जाता है वहीं मानवता के गुणवत्ता में पिछड़ा साबित हो रहा है। यह आकलन मेरा है, मैं सब का तो नहीं कह सकती परन्तु मेरे नजरिए में जरूर है।

एक अनबोलते जानवर के साथ इस तरह के व्यवहार करने वाले ना जाने कहां से मनुष्य के प्रजाति में आ जाते है। जिनमे ना लाज्जा है ना शर्म और ना ही दया।

वाक्या कुछ यूं है कि पिछले यानी मई के 25 तारीख को केरल के पलक्कड जिले में एक ऐसे ही मनुष्य ने एक गर्भवती हथिनी को अनानास के भीतर पटाखा डाल कर उसे खाने को दे दिया। वह हथिनी भूखी जंगल से खाने के तलाश में गांव की तरफ आई थी जहां उसे खाने को तो जरूर मिला लेकिन उस खाने के साथ उसकी जान भी चली गई। अनानास खाने के दौरान उसके अंदर रखा पटाखा फट गया जिस से उस 12 साल की हथिनी के गले और सुढ़ और मुंह का निचला हिस्‍सा,जीभ बुरी तरह जल गया। ऐसे में दर्द के कारण वह कुछ खा नहीं पा रही थी और उसने पास के ही एक नदी में जा कर अपनी सूढ़ और सिर के निचले हिस्से को लंबे समय तक पानी में डाले रखा। शायद पानी के अंदर उसके मुंह की जलन को थोड़ी शांति मिल रही थी ,लेकिन उस पेट के भूख को नहीं। लंबे समय तक हथिनी भूखी ,दर्द से कराहती रही। इस दौरान उसके पेट में पलने वाला छोटा बच्चा भूखे जीवित नहीं रह सका।

पागल हाथी की कहावतें और तबाही हम सब सुनते आएं है और देखते भी,लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।
जल की पीड़ा में इंसान भी पागल हो जाता है और हाथी तो इंसान से कई सौ गुना ताकतवर माना जाता है इसके बावजूद उस हथिनी ने किसी का भी नुकसान नहीं पहुंचाया। वह चाहती तो आस पास के इलाकों में जाकर लोगों को नुक्सान भी पहुंचा सकती थी लेकिन वह हथिनी वहीं खड़ी रही। वन्यकर्मियों को हाथी के लंबे समय तक पानी में खड़े रहने की सूचना के बाद उन्होंने उसके इलाज के लिए उसे नदी से बाहर लाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली और हथिनी ने वेल्लियार नदी में 27 मई को अपना दम तोड़ दिया।

इसके गर्भवती होने और पूरे स्थिति की पूरी जानकारी तब मिली जब वन विभाग हथिनी के शव को पोस्टमार्टम के लिए लेकर गए जहां पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि वह गर्भवती थी और अगले 15 से 18 महीनों में वो अपने बच्चे को जन्म देती यानी इस हथिनी के पेट में लगभग 5 महीने का छोटा बच्चा था।

यह पहली घटना नहीं है इस से कुछ दिनों पहले भी एक घटना सामने आयी थी।इस से पहले कोल्लम जिले के पुनालुर डिवीजन के अंतर्गत पठानपुरम वन रेंज क्षेत्र में अप्रैल में इसी तरह की एक और मादा हाथी मिली थी। सूत्रों के अनुसार वह हाथिनी भी गंभीर हालत में पाई गई थी। उसका जबड़ा टूटा हुआ था और वह खाने में असमर्थ थी।लगातार हम ऐसी घटनाएं देखते है लेकिन फिर शायद भूल भी जाते हैं।

एक तरफ हम शहरी करण के लिए लगातार जंगलों को काटते चले आ रहें है और दूसरी ओर उनमें रहने वाले जानवरों की हत्या भी आखिर ये जाएं तो कहां जाएं?
भारतीय दंड संहिता की धारा 428 और 429 के मुताबिक किसी पशु को मारना या अपंग करना, भले ही वह आवारा क्यों न हो, दंडनीय अपराध है, और किसी भी जंगली जानवर को पकड़ना, फंसाना, जहर देना या लालच देना दंडनीय अपराध है। इसके दोषी को सात साल की तक की सजा या 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। अब सवाल यह है कि इतने कानून बनने बाद भी आज ऐसी स्थिति क्यों है?
क्या मनुष्य अपनी मनुष्यता खो चुका है ?
आज इस घटना के बाद जवाब मांगे जा रहे हैं, करवाई किए जा रहे हैं और शोक व्यक्त भी जारी है। यहां तक कि इस घटना पर अब राजनीति भी शुरू हो गई है ,लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस हथिनी को पटाखा देने वाला व्यक्ति हम और आप में से ही कोई एक है।

इसलिए आप सबों से एक आग्रह है अगली बार जब कभी आपके सामने कोई भूखे दिखे, तो अगर आप उसे भोजन दे सकते हैं तो दें अन्यथा जाने दें, बदले में उसकी जान ना लें।

धन्यवाद

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