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Another Jumla from Finance Minister Nirmala Sitharaman – Congress Party slams Finance Minister Nirmala Sitharaman over Coronavirus economic package for farmers – भाजपा ने दिया देश की जनता को फिर से जुमला पैकेज :- रणदीप सिंह सुरजेवाला

भाजपा ने दिया देश की जनता को फिर से जुमला पैकेज :- रणदीप सिंह सुरजेवाला

Another Jumla from Finance Minister Nirmala Sitharaman – Congress Party slams Finance Minister Nirmala Sitharaman over Coronavirus economic package for farmers

श्री रणदीप सिंह सुरजेवाला ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि आज तीसरे दिन का आर्थिक पैकेज जो पूरी तरह से खेती-बाड़ी को लेकर है, वो देश ने देखा और सुना।

प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की 3 दिन की ‘जुमला पैकेज घोषणाओं’ से एक बात साफ है – मोदी सरकार ‘हैडलाईन मैनेजमेंट’ से ‘हैल्पलाईन मैनेजमेंट’ तक का सफर तय करने में फेल साबित हुई है। 20 लाख करोड़ का पैकेज देशवासियों के लिए ‘राहत का पैकेज’ कम बल्कि ‘वूडू इकॉनॉमिक्स पैकेज’ (Voodoo Economics Package) अधिक साबित हुआ है। ‘वादों के सब्जबाग’ से ‘मदद की हकीकत’ तक पहुंचने में सरकार ने पूर्णतया देश को निराश किया है।

कोरोना महामारी में सबसे बड़ा संकट ‘अन्नदाता किसान’ व ‘राष्ट्रनिर्माता मजदूर’ झेल रहे हैं। मरहम लगाने की बजाए मोदी सरकार किसान-मजदूर को घाव दे रही है तथा मदद करने की बजाए सरकार किसान को कर्ज के जंजाल में धकेल रही है। एक बात साफ है कि मोदी सरकार न किसान की पीड़ा समझती और न ही खेती की समस्या। इसीलिए खेती के नाम पर परोसे जा रहे सब्जबागों में एक फूटी कौड़ी भी मदद के नाम पर किसान को नहीं मिल पाई।

  1. रबी फसलों की कीमत न मिलने से किसान को 50,000 करोड़ रु. से अधिक का नुकसान – नुकसान भरपाई के नाम पर नहीं दी एक फूटी कौड़ी।

आज किसान को फसल की आकर्षक कीमत देने बारे बड़ी-बड़ी बातें तो की गईं पर यह नहीं बताया कि मोदी सरकार MSP पर ही फसल नहीं खरीद रही। क्या वित्तमंत्री यह जानती हैं कि सरकार कुल फसल उत्पादन का मुश्किल से 25-30 प्रतिशत ही MSP पर खरीदती है, वो भी खासकर गेहूँ और धान, क्योंकि इसे राशन प्रणाली के माध्यम से वितरित किया जाता है। 2019-20 में रबी एवं खरीफ फसल का कुल उत्पादन 26.9 करोड़ टन हुआ पर सरकार द्वारा खरीद की गई मात्र 7.19 करोड़ टन अनाज की, यानि 26.72 प्रतिशत। बाकी बाजार में बिका। परंतु कोरोना संकट के चलते बाजार तो उपलब्ध ही नहीं, तो किसान क्या करे?

2020-21 के रबी सीज़न में गेहूँ का अनुमानित उत्पादन है 10 करोड़ टन। यानि 1,925 रु. प्रति क्विंटल की MSP से लागत होगी 1,92,500 करोड़ रु.। मोदी सरकार MSP पर गेहूँ की खरीद कर रही है मात्र 35 प्रतिशत, यानि 350 लाख टन। बाजार के अभाव में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व अन्य राज्यों से खबरें सामने आई हैं कि किसान की गेहूँ 1,400 से 1,600 रु. क्विंटल बिक रही है, यानि MSP से 325 रु. प्रति क्विंटल कम। केवल इसी से किसान को अकेले गेहूँ में 21,000 करोड़ रु. का नुकसान होगा। इसी प्रकार चना, मसूर, सरसों जैसी रबी की प्रमुख फसलों में MSP से भी कम कीमत मिलने से होने वाला नुकसान लगभग 21,000 करोड़ रु. है। यही हाल फल, सब्जी, फूल पैदा करने वाले किसान को हुए नुकसान का है। वो केले लगाने वाला किसान हो या फिर अंगूर, सेवफल या संतरे वाला किसान। टमाटर, आलू, प्याज पैदा करने वाला किसान हो या अन्य सब्जियां व फूल पैदा करने वाला। अकेले मार्च-अप्रैल माह में फल, सब्जी, फूल पैदा करने वाले किसान को 10,000 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है। पर 50,000 करोड़ रु. से अधिक के नुकसान की भरपाई बारे एक फूटी कौड़ी सहायता के नाम पर नहीं दी।

  1. किसान को दिया जा रहा MSP फसल की लागत से भी कम है। परंतु न इसका हल बताया और न ही सही कीमत देने का रास्ता। केवल नया कानून बनाने के जुमले से क्या किसान को फसल का सही मूल्य मिल पाएगा? काश वित्तमंत्री रबी फसलों के लिए दी गई ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ की 2020-21 की रिपोर्ट पढ़ लेतीं, तो देश को झूठ बोलकर बरगलाने से बच जातीं।

आज किसानों को समर्थन मूल्य से भी अधिक फ़सल की लागत आ रही है। ये हम नहीं कह रहे हैं, ये प्रधानमंत्री जी का गृह प्रदेश गुजरात, भाजपा शासित हरियाणा व मध्यप्रदेश जैसे प्रांत कह रहे हैं। आज गेहूँ का MSP 1,925 रु/क्विंटल है मगर गुजरात सरकार कहती है कि उन्हें लागत 2020-21 में 1,949 रु प्रति क्विंटल आती है। हरियाणा कहता है कि उसको गेहूँ का लागत मूल्य 2,081 रु. प्रति क्विंटल है (कृषि लागत एवं मूल्य आयोग रिपोर्ट 2020-21)।चने का MSP 4875 रु. प्रति क्विंटल है और हरियाणा भाजपा सरकार कहती है कि किसानों का लागत मूल्य ही 5289 रु. प्रति क्विंटल है।अर्थात बाज़ार में किसानों को फ़सल के दाम नहीं मिल रहे और न ही सरकार MSP पर खरीद रही। तो ऐसे में एक और कानून से किसान को क्या मिलेगा।

  1. किसान सम्मान निधि योजना का सच

भारत में 14.64 किसान हैं (एग्रीकल्चर सेंसस 2016)। इनमें से सरकार ने अभी तक 8.22 करोड़ किसानों को ही किसान सम्मान निधि के लिए चिन्हित किया है। यानि 6.42 करोड़ किसान तो चिन्हित ही नहीं हो पाए। मोदी सरकार कहती है कि इन्हें 6,000 रु. प्रतिवर्ष दिया जा रहा है। मगर सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने खेती का लागत मूल्य बीते 5 वर्षों में लगभग 15,000 रु. प्रति हेक्टेयर बढ़ा दिया है।

मोदी सरकार ने डीज़ल पर एक्साईज़ ड्यूटी 3.56 रु. प्रति लीटर से बढ़ाकर 31.83 रु. प्रति लीटर कर दी। यानि 5.5 साल में अकेले डीज़ल पर 28.27 रु. प्रति लीटर टैक्स बढ़ा दिया। यह अपने आप में 800 प्रतिशत टैक्स की वृद्धि है। सुपर खाद के 50 किलो के कट्टे की कीमत 260 रु. से बढ़ाकर 350 रु. कर दी।यही नहीं पहली बार खेती पर जीएसटी लगाया गया। खाद पर 5 प्रतिशत जीएसटी, कीटनाशक दवाईयों पर 18 प्रतिशत जीएसटी, खेती के उपकरणों पर 12 प्रतिशत जीएसटी व ट्रैक्टर के टायरों तक पर 18 प्रतिशत जीएसटी।

ऐसे में 15,000 रु. प्रति हेक्टेयर किसान से ले लिया और मात्र 6,000 रु. सालाना आधे किसानों को दिया।

  1. प्राईवेट कंपनियों के मुनाफे की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

आज वित्तमंत्री ने फसल बीमा योजना के कसीदे तो पढ़े पर यह नहीं बताया कि असल में यह निजी कंपनी मुनाफा योजना है। साल 2016-17 से खरीफ 2019 तक देश के किसानों, केंद्र व राज्य सरकारों ने कुल बीमा प्रीमियम की राशि चुकाई – 99,046 करोड़ रु., पर किसानों को मुआवज़ा हासिल हुआ केवल, 72,952 करोड़ रु.। यानि बीमा कंपनियों ने मुनाफा कमाया 26,094 करोड़ रु.।

  1. मार्जि़नल किसान को दिए जाने वाले कर्ज की असलियत

वित्तमंत्री ने 3 करोड़ मार्जिनल किसानों को 4,00,000 करोड़ का फसली लोन उपलब्ध करवाने बारे अपनी पीठ थपथपाई। पर यह बताना भूल गईं कि एग्रीकल्चर सेंसस 2016 के मुताबिक देश में 10 करोड़ मार्जिनल किसान हैं, जो एक हेक्टेयर से कम भूमि जोतते हैं। तो फिर 7 करोड़ मार्जिनल किसानों का क्या होगा?

वित्तमंत्री ने ही लोकसभा में 1 जुलाई, 2019 को बताया था कि छोटे किसानों को साल 2018-19 में 6,26,087 करोड़ रु. का ऋण उपलब्ध कराया गया है। तो क्या इस बार यह ऋण 6.26 लाख करोड़ से घटकर 4 लाख करोड़ रह जाएगा। 6 लाख 26 हजार करोड़ का कर्ज, अब कोरोना महामारी में आप इसे कम करके 4 लाख करोड़ कर रही हैं, ऐसा जुल्म और ज्यादती क्यों?

सच्चाई ये है कि एक फूटी कौड़ी भी ना कल और ना आज किसान और खेत मजदूर के हिस्से में आई, ना एक रुपया उसकी जेब में गया, ये जो ‘वूडू इकोनॉमिक पैकेज’ है वित्त मंत्री जी का, जो केवल ‘जुमला घोषणा पैकेज’ है, इससे ना किसान को राहत मिलेगी, ना खेत मजदूर को राहत मिलेगी। किसान और खेत मजदूर आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ वो मोदी सरकार से निराश भी है और अपने आपको ठगा हुआ भी महसूस करता है।

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