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अपने घर वापसी के लिए तरस रहे दिहाड़ी मजदूर….

अपने घर वापसी के लिए तरस रहे दिहाड़ी मजदूर….

आज की भी सुबह वैसी ही थी जैसी पिछ्ले 44 दिनों से चल रहे लॉक डाउन में थी। आज के भी सुबह में कोई बदलाव नहीं दिख रहे थे क्यों की स्थिति ही कुछ ऐसी बनी हुई है।कोरोना कि महामारी की वज़ह से देश में चल रहे तीसरे चरण के लॉक डाउन में लोगों को कुछ ऐतिहात तो मिल गए  लेकिन सवाल उनके लिए था जो इस दौरान बेघर और लाचार थें। माना हमें भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा और पड़ रहा है लेकिन उनका क्या जो इस दौरान जिन्हें संक्रमण से बचने के साथ साथ अपनी रोजी रोटी की भी चिंता सता रही है।भारत के कई शहरों में फंसे हजारों प्रवासी मज़दूरों के पास न तो नौकरी है और न ही पैसा और लॉक डाउन के दौरान ऐसी परिस्थिति आ चुकी थी कि कई हजार मजदूर पैदल ही अपने राज्यों की ओर जाने के लिए मजबूर हो गए थे।

इस दौरान इनकी स्थिति इतनी दयनीय बन चुकी है कि जो मजदूर अपने घर से दूर किसी राज्य में काम करने आया था वो बस अब अपने अपनों के पास घर जाना चाहता है ।लॉक डाउन के तीसरे चरण में केंद्र सरकार ने स्थिति को देखते हुए ,जो मजदूर इस लॉक डाउन की वजह से दूसरे राज्यों में फंसे थें उन लोगों को घर वापस लाने के लिएराज्यों की मांग पर केंद्र सरकार ने ट्रेन से मज़दूरों और दूसरे लोगों को वापस लाने की अनुमति दी है और 115 स्पेशल ट्रेनें शुरू की। 

इसके बाद तेलंगाना से झारखंड तक के लिए पहली श्नमिक स्पेशल ट्रेन चली ,जिसमें कुल 1233 प्रवासियों को झारखंड के लिए रवाना किया और फिर धीरे धीरे उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश,बिहार राज्य सरकार अपने अपने मजदूरों को वापस ला रहे हैं लेकिन लॉक डाउन के नियमों को पालन करते हुए।चलिए अब मुद्दे पर आते हैं विगत पिछ्ले दिनों खबर यह सामने आयी की कर्नाटक सरकार ने अपने राज्य के श्रमिकों को उनके राज्य भेजने के निर्णय से फिसल गए।

कर्नाटक सीएम बीएस येदियुरप्पा ने यह घोषणा की कि “राज्य में कोविड-19 की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में नियंत्रण में है, इसलिए रेड जोन को छोड़कर बाकी स्थानों में व्यवसाय, भवन निर्माण और औद्योगिक गतिविधियां शुरू करने की आवश्यकता है। मजदूर अनावश्यक रूप से जा रहे हैं ,इन्हें जाने की अनुमति नहीं है। इसके साथ ही कर्नाटक से खुलने वाली श्रमिकों की स्पेशल ट्रेनें बन्द करवा दिए। 

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अब सवाल यह है कि क्या सीएम येदियुरप्पा के सामने मजदूरों को जिंदगी जीने का अधिकार नहीं? क्या आपका घर बनाने वाले बुरी परिस्थितियों में अपने घर जाने की कामना नहीं कर सकता? क्या सरकार के लिए इनके अधिकारों की कोई मूल्य नहीं?

हालांकि कर्नाटक सरकार ने अपनी गलती को सुधारते हुए  फिर से ट्रेनें 8 मई से 15 मई तक अनुमति दी है लेकिन क्या आपको नहीं लगता आज जो भी  हमारे देश के श्रमिक हैं, मजदूर हैं,सब्जी वाले ,रेहड़ी वाले उन्हें उनके घर पहुंचाया जाए??आशा है आप भी अपने घर जरूर पहुचेंगे,क्यों ही आपने ही हमको हमारा घर दिया है।…

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